इस्लाम में समानता और असमानता की अवधारणा: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पसमांदा मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व एवं सामाजिक न्याय का एक विस्तृत अध्ययन (2014-2024)
संकेतशब्द
पसमांदा मुसलमान, जातिगत भेदभाव, सामाजिक न्याय, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, अंतर्विभाजकता, सामाजिक-आर्थिक वंचना, पश्चिमी उत्तर प्रदेशसार
यह शोध पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दस जिलों—मेरठ, मुज़फ्फरनगर, सहारनपुर, अमरोहा, बिजनौर, शामली, बागपत, बुलंदशहर, अलीगढ़ तथा मुरादाबाद—में पारंपरिक जाति-आधारित व्यवसायों में संलग्न पसमांदा मुसलमानों (अंसारी, मनिहार, कुंजड़ा, कसाई, नट, धोबी, तेली, रंगरेज, हलालखोर, चिक) की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की उपलब्धता का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। इस्लाम की समानता और भाईचारे की मूल शिक्षाओं के विपरीत, भारतीय मुसलमानों के बीच जाति-आधारित भेदभाव और पदानुक्रमिक संरचना व्याप्त है। 200 प्रतिवादियों पर आधारित इस अध्ययन में पाया गया कि 52% परिवारों की मासिक आय ₹5,000-10,000 के बीच है, 30% निरक्षर हैं, 69% ने जातिगत भेदभाव का अनुभव किया है, और 86% का मानना है कि राजनीतिक दल उच्च जाति के मुसलमानों (अशरफ) को प्राथमिकता देते हैं। नट समुदाय सबसे अधिक वंचित है—60% कच्चे मकानों में रहते हैं, 80% के पास शौचालय नहीं हैं, और 100% को स्कूल या स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच नहीं है। 2014-2024 के दशक में सरकारी योजनाओं के बावजूद, केवल 32% को लाभ मिला और 64% आरक्षण के प्रति अज्ञान हैं। अध्ययन जाति, धर्म और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के अंतर्विभाजक प्रभाव को रेखांकित करता है और नीतिगत हस्तक्षेप, सामुदायिक संगठन तथा सामाजिक जागरूकता की तत्काल आवश्यकता पर बल देता है। शोध निष्कर्ष बताते हैं कि पसमांदा मुसलमानों की वंचना संरचनात्मक और प्रणालीगत है, जिसे समाप्त करने के लिए संवैधानिक सुधारों, शैक्षिक आरक्षण, आर्थिक सशक्तिकरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वृद्धि की आवश्यकता है।
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